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मुर्गी पालन

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ऐसे करें मुर्गी पालन (poultry farming) की शुरूआत
मुर्गी पालन की शुरुआत अपने गांव या शहर से थोड़ी दूरी पर करना चाहिए ताकि मुर्गियों पर प्रदूषण का असर न हो। पोल्ट्री फार्मिंग के लिए ऐसी जगह चुनें जहां साफ पानी, हवा-धूप और वाहनों के आने-जाने का अच्छा इंतजाम हो। 100 मुर्गी के लिए 100X200 फीट जमीन पर्याप्त होती है। अगर इससे कम जगह हो तो मुर्गी को परेशानी हो सकती है। अगर आप 150 मुर्गियों से अपने व्यवसाय की शुरूआत करते हैं तो आपको 150 से 200 फीट जमीन की आवश्यकता होगी। अगर आप शेड बनाना चाहते हैं तो जगह साफ-सुथरी और खुली होनी चाहिए। जगह खुली हो और सुरक्षित भी होनी जरूरी है ताकि मुर्गियों को हवा मिलती रहे और किसी बीमारी का खतरा भी न हो।
सबसे पहले मुर्गियों के बारे में समझें (First understand about chickens)
मुर्गी पालन के बिजनेस में आपको सबसे पहले फैसला लेना है कि आप किस तरह की मुर्गी पालना चाहते हैं, आप क्या मीट के लिए खोलना चाहते हैं या अंडे या फिर अंडे मीट दोनों के लिए, मुर्गी तीन प्रकार की होती हैं।
लेयर मुर्गी
ब्रॉयलर मुर्गी
देसी मुर्गी
लेयर मुर्गी पालन (layer farming)
लेयर मुर्गी का इस्तेमाल अंडे पाने के लिए किया जाता है। ये 4 से 5 महीने की होने के बाद अंडे देना शुरू करती है। इसके बाद ये लगभग एक साल तक अंडे देती है। फिर जब इनकी उम्र 16 महीने के आसपास होती है तब इनका मीट बेच दिया जाता है।
ब्रॉयलर मुर्गी पालन (Broiler poultry farming)
इनका इस्तेमाल ज्यादातर मीट के लिए किया जाता है। ये दूसरे प्रकार की मुर्गी की तुलना में तेजी से बढ़ती है। यही वजह है जो इनको मीट के रूप में इस्तेमाल के लिए सबसे बेहतर बनाता है।
देसी मुर्गी पालन (deshi murgi palan)
आखिरी होती है देसी मुर्गी, इसका इस्तेमाल अंडे और मांस दोनों के लिए किया जाता है। आप किस तरह की मुर्गी का पालन करना चाहते हैं फैसला कर सकते हैं, उसी के बाद चूजों को खरीदना होगा।
बिजनेस के लिए मुर्गी की नस्लें (chicken breeds for business)
भारत में देसी मुर्गी की कुछ दमदार प्रजातियां हम आपको बताने जा रहे हैं। लेकिन इन सभी प्रजातियों में से देशी मुर्गियों की प्रजाति पालन की दृष्टि से सबसे बेहतर मानी जाती है। तो चलिए देखते हैं आपके बिजनेस में कौन सी नस्ल चार चांद लगा सकती है।
असेल नस्ल (Aseel)

ये नस्ल भारत के उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और राजस्थान में पाई जाती हैं। इस नस्ल का चिकन बहुत अच्छा होता है। इन मुर्गियों का व्यवहार बहुत ही झगड़ालू होता है इसलिए मानव जाति इस नस्ल के मुर्गों को मैदान में लड़ाते हैं। मुर्गों का वजन 4-5 किलोग्राम और मुर्गियों का वजन 3-4 किलोग्राम होता है। इस नस्ल के मुर्गे-मुर्गियों की गर्दन और पैर लंबे होते हैं और बाल चमकीले होते हैं। मुर्गियों की अंडे देने की क्षमता काफी कम होती है।
कड़कनाथ नस्ल (Kadaknath Breed)

इस नस्ल का मूल नाम कलामासी है, जिसका अर्थ काले मांस वाला पक्षी होता है। कड़कनाथ नस्ल मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा पाया जाता है। इस नस्ल के मीट में 25 फीसदी प्रोटीन पाया जाता है। जो अन्य नस्ल के मीट की अपेक्षा अधिक है। कड़कनाथ नस्ल के मीट का उपयोग कई प्रकार की दवाइयां बनाने में भी किया जाता है। इसलिए व्यवसाय की दृष्टि से ये नस्ल बहुत लाभदायक है। ये मुर्गिया हर साल लगभग 80 अंडे देती हैं। इस नस्ल की प्रमुख किस्में जेट ब्लैक, पेन्सिल्ड और गोल्डेन हैं।
चिटागोंग नस्ल (Chittagong)

ये नस्ल सबसे ऊंची नस्ल मानी जाती है। इसे मलय चिकन के नाम से भी जाना जाता है। इस नस्ल के मुर्गे 2.5 फीट तक लंबे और इनका वजन 4.5- 5 किलोग्राम तक होता है। इनकी गर्दन और पैर बाकी नस्ल की अपेक्षा लंबे होते हैं। इस नस्ल की हर साल अंडा देने की क्षमता लगभग 70-120 होती है।
स्वरनाथ नस्ल (Swarnath)

इस नस्ल की मुर्गियों को घर के पीछे आसानी से पाला जा सकता है। ये 22 से 23 हफ्ते में पूर्ण परिपक्व हो जाती हैं और तब इनका वजन 3 से 4 किलोग्राम होता है। इनकी प्रतिवर्ष अण्डे उत्पादन करने की क्षमता लगभग 180-190 होती है।
वनराजा नस्ल (Vanraja Breed)

शुरुआत में मुर्गी पालन करने के लिए यह प्रजाति सबसे अच्छी मानी जाती है। ये मुर्गी 3 महीने में 120 से 130 अंडे तक देती है और इसका वजन भी 2।5 से 5 किलो तक जाता है। हांलाकि ये प्रजाति अन्य प्रजाति से थोड़ा कम सक्रिय रहती हैं।
मुर्गी पालन के लिए चूजे कहां से लें? (Where to get chicks for poultry farming?)

अगर जगह का चयन और मुर्गी के प्रकार का चयन कर लिया है तो अब चूजों को लाने के बारे में सोचना पड़ेगा। मुर्गी पालन में बेहतर और निरोगी चूजों का चयन करना बेहद जरूरी है ताकि आपको व्यवसाय में अधिक लाभ मिल सकेगा। इस बात का ध्यान रखें कि एक भी चूजा बीमार न हो क्योंकि अगर एक भी चूजा बीमार हुआ तो अन्य को भी बीमार कर देगा, इसलिए किसी जाने-माने एक्सपर्ट की मदद से ही चूजों को लाएं।
मुर्गियों के लिए आहार प्रबंधन (Diet Management for Chickens)

जगह का चयन करने के बाद आपको मुर्गियों के उचित रख-रखाव पर ध्यान देना होगा। शेड में आपको पानी की पर्याप्त व्यवस्था करनी होगी। 1 ब्रॉयलर मुर्गा 1 किलो दाना खाने पर 2-3 लीटर पानी पीता है। गर्मियों में पानी दोगुना हो जाता है। जितने सप्ताह का चूजा उसमें 2 गुणा करने पर जो मात्रा आएगी, वह मात्रा पानी की प्रति 100 चूजों पर खपत होगी। आपको अपने मुर्गियों और चूजों को सुखी जमीन में रखना होगा। गीली जगह में रखने पर उनके बीमार होने का खतरा बढ़ जाता है। शेड को कुछ ऐसा बनवाएं ताकि कम खर्च में आपको बेहतर परिणाम मिले।
व्यावसायिक मुर्गी पालन में अच्छे परिणाम के लिए चारा और चारे का कुशल का प्रबंधन बेहद जरूरी है। यहां यह ध्यान देना बेहद जरूरी हो जाता है कि जो चारा हम मुहैया करा रहे हैं उसमे सभी जरूरी पोषक तत्व यानी कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, मिनरल्स और विटामिन्स भी शामिल हों। नियमित पोषक तत्वों के अलावा अलग से कुछ और बेहतर पोषक तत्व देने की जरूरत है जिससे खाना ठीक से पच सके और साथ ही उनका जल्दी से विकास हो सके।
अगर आप चूजों में ज्यादा विकास देखना चाहते हैं तो आप उन्हें अलसी और मक्का भी दे सकते हैं ये दोनों ही उनके विकास में काफी सहायक होते हैं। अगर ठीक से खाना दिया जाए तो एक चूजे को 1 किलो वजन करने में लगभग 40-45 दिन लग सकते हैं। वजन बहुत की जरूरी होता है इसलिए खाने का विशेष ध्यान रखें।

पॉल्ट्री फीड/चारे के प्रकार (Types of Poultry Feed)


चूजे की उम्र :- 0-10 दिन , प्री स्टार्टर - 11-21 दिन, स्टार्टर -22 दिन से ऊपर


चारे की किस्म :-
अब आपने मुर्गियां खरीद ली, खाने भी देने लगे लेकिन ठहरिए…
क्या आप जानते हैं मुर्गियों में कौन सी बीमारियां होती हैं? उनके लक्षण क्या हैं, बीमारियों की रोकथाम कैसे की जा सकती है। टीकाकरण का तरीका क्या है? ये भी जानना जरूरी है।
मुर्गियों में होने वाली कुछ प्रमुख बीमारियां, बचाव और ट्रीटमेंट (Some major diseases, prevention and treatment of chickens)
रानीखेत रोग :-
ये मुर्गियों में होने वाली सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक है। इसे न्यू कैसल के नाम से भी जाना जाता है। यह एक संक्रामक रोग है, जो मुर्गी पालन के लिए अत्यधिक घातक है, इसमें मुर्गियों को सांस लेने में परेशानी होती है और उनकी मौत हो जाती है। संक्रमित होने पर मुर्गियां अंडा देना भी बंद कर देती हैं। पैरामाइक्सो वायरस की वजह से ये बीमारी होती है।
लक्षण: मुर्गियों में तेज़ बुखार होता है, सांस लेने में दिक्कत होती है। अंडों के उत्पादन में कमी आती है।
ट्रीटमेंट:

इस बीमारी का अब तक कोई ठोस इलाज नहीं है। हालांकि, टीकाकरण के ज़रिए इससे बचाव संभव है। R2B और एन।डी।किल्ड जैसे वैक्सीन इनमें अहम हैं। जानकारों के मुताबिक 7 दिन, 28 दिन और 10 हफ्ते में मुर्गियों का टीकाकरण किया जाना सही होता है।
बर्ड फ्लू:

यह मुर्गियों और दूसरे पक्षियों में होने वाली एक घातक बीमारी है। ये बीमारी इन्फ्लूएंजा-ए वायरस की वजह से होती है। यदि एक मुर्गी को ये संक्रमण हो जाए, तो दूसरी मुर्गियां भी बीमार पड़ने लगती हैं। संक्रमित मुर्गी की नाक व आंखों से निकलने वाले स्राव, लार और बीट में ये वायरस पाया जाता है। 3 से 5 दिनों के भीतर इसके लक्षण दिखने लगते हैं। लक्षण:मुर्गी के सिर और गर्दन में सूजन आ जाती है। अंडे देने की क्षमता कम हो जाती है। मुर्गियां खाना-पीना बंद कर देती हैं। तेज़ी से मरने भी लगती हैं।
ट्रीटमेंट:

बर्ड फ्लू का कोई परमानेंट ट्रीटमेंट नहीं है। इस बीमारी से बचाव ही एकमात्र उपाय है।
इस बीमारी में मुर्गियों में छोटी-छोटी फुंसियां हो जाती हैं। आंख की पुतलियों और सिर की त्वचा पर इन्हें आसानी से देखा जा सकता है। ये भी एक वायरस जनित रोग है, जिसका संक्रमण तेज़ी से फैलता है।
लक्षण:
आंखों से पानी बहने लगता है। सांस लेने में परेशानी होती है, मुर्गियां खाना-पीना कम कर देती हैं। अंडे देने की क्षमता में कमी आती है। मुंह में छाले पड़ जाते हैं। संक्रमण बढ़ने पर मुर्गियों की मौत भी हो जाती है।
ट्रीटमेंट:

देखा जाए तो बचाव ही इसका सबसे बेहतर इलाज है। हालांकि, लेयर मुर्गियों में 6 से 8 हफ्तों में वैक्सीनेशन कर इससे बचा जा सकता है।